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Thursday

सहपाठी की सिख हिंदी कहानी


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सहपाठी की छोटी सी सिख काम आई 

इंटर की परीक्षा देने के बाद मैंने एक सरकारी कॉलेज में एडमिशन ले लिया था कॉलेज मेरे घर से करीब १० किमी दूर था इसलिए में कॉलेज के पास ही कमरा लेकर पढाई करने लगा यह पहली बार था जब में घर से दूर अकेला रह रहा था इससे पहले मैंने घर से कभी दूर नहीं रहा था इसलिए थोड़े समय के बाद ही घर की याद आने लगती थी और घर भी ज्यादा दूर नहीं था, तो जब भी मोका मिलता मैं घर के लिए निकल जाता | घर जाने के लिए जानी की लिए बस और ट्रेन दोनों सुविधाए मौजूद थे लेकिन में स्वभाव से खर्चीला और दिखावे के लिए मैं बस से ही घर जाना पसंद करता था |

घर की आर्थिक स्तिथि बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन मैं इसके बारे में कभी सोचता नहीं था जब भी माँ – बाबा से पैसे की फरमाइश करता वो पूरी कर देते थे | मैं ये भी नहीं सोचता था माँ – बाबा किन हालातों से जूझते हुए इंजिनियर की पढ़ाई करा रहे थे मेरे इंजिनियर बनने की ख़ुशी में बाबा इतने खुश थे की वे कभी ये भी नहीं पूछते की तुम्हारी पढाई कैसी चल रही है या तुम्हारा आने वाला भविष्य कैसा होगा ? वो जब भी मिलते बीएस यशी कहते की तुम्हे खर्च के लिए कितने पैसे चाहिए ? इसलिए मेरे पास हमेशा पैसे बने रहते थे शायद यही कारण था की बस का किराया ट्रेन के किराये से चार गुना होने के बाद भी में बस से जाना पसंद करता था |

मैं किसी काम में इंतजार नहीं करता था न ही कभी खरीददारी करते समय यह सोचता था की यह चीज मेरे लिए कितनी उपयोगी है या मेरे बजट से बाहर की या नहीं है मैं महीने में तीन चार बार घर जाता था जिससे हजार रूपए से अधिक मेरे किराये में चले जाते थे जबकि अगर ट्रेन में सफर करता तो मुश्किल से दो तीन सौ रूपए ही खर्च होते | मैं हमेशा सोचता था ट्रेन में सिर्फ सामान्य लोग ही यात्रा करते है जब मेरे पास रूपए है तो मैं ट्रेन में सफर क्यूँ करूँ ? ठाठ से बस से यात्रा क्यूँ न करूँ ? समय बीत रहा था और मैं एक धनी परिवार के बेटे की तरह अपनी जिन्दगी जी रहा था मुझे पढाई से ज्यादा अपने स्टाइल और स्टेटस का ख्याल रहता था | घर की माली की हालत कैसी है या मेरे लिए किस तरह से पैसे का इंतजाम किया जाता था यह बात मैंने कभी सोची नहीं थी |

मेरे साथ कॉलेज में पढने वाला एक दोस्त था उसका घर मेरे घर से थोड़ी दूर ही था वह भी एक सामान्य घर से सम्बन्ध रखता था जब भी मैं उससे घर चलने के लिए कहता तो वह अक्सर मना कर देता और कभी घर जाता तो ट्रेन में जाना पसंद करता था एक बार वो भी घर जा रहा था उसने मुझसे अपने साथ चलने काना और साथ चलने की ज़िद करने लगा | मजबूरन मैंने साथ चलने की सहमती जता दी किसी त्यौहार का समय था इसलिए ट्रेन में काफी भीड़ थी मुहे गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं उससे कुछ कह नहीं पाया मैं जनना चाहता था की वह ट्रेन में जाना क्यूँ पसंद करता है |

किसी तरह हम दोनों को सीट मिल गयी मेरा मुह भापकर उसने धीरे से कहा की तुम्हे मेरे घर की स्तिथि के बारे में तो पता है और तुम अपने घर के हाल भी जानते हो कभी सोचा है की तुम्हारे बाबा किस तरह तुम्हारी पढ़ाई का खर्चा उठा रहे है ? वो तो किसी तरह से तुम्हे इंजिनियर बनना देखना चाहते है, इसलिए कभी कुछ कहते नहीं है बस तुम्हे पैसे देते रहते है मगर तुम तो सोचा करों |

उसकी बात सुनकर थोड़े समय के लिए मैं शून्य हो गया मुझे घर के माली की हालत का ख्याल आने लगा मुझे लगा की वास्तव में मैं न तो पैसे की अहमियत समझता हूँ और न ही घर के हालात के बारे में सोचता हूँ मुझे उस सच्चे दोस्त ने रास्ता दिखा दिया था उस दिन से मैंने अपना व्यवहार बदल लिया और अच्छे से पढाई करने लगा |


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